रविवार, 22 मई 2011

यह कैसा घर ?

यह कैसा घर ?
जहॉ बिस्तर पर उगी है नागफनी
आंगन में घूमते हैं संपोले
सोफे पर बिखरी हैं चींटियॉ,
खूंटी पर टंगे हैं रिश्ते
,बालकनी में लटका है भरोसा,
बाथरूम की नाली में बह गयी हैं परंपरायें
हवा में फैला है जहरीला धुंवा
दीमकों ने चाट लिये हैं
सुरक्षा के तने,
संस्कारो को निगलता टेलीविजन,
और पूजाघर में
कुछ इस तरह बंसी बजाते श्री कृश्ण
जैसे रोम के जलने पर
बंसी बजाता रहा था
वहॅा का शासक नीरो
सचमुच कैसा है यह घर ?

5 टिप्‍पणियां:

  1. अदभुत बिम्ब .... अच्छा लगा आपका काव्य संसार ।

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  2. कल 14/10/2011 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  3. देश का समाज का हाल बयां कर दिया ,बधाई ।

    उत्तर देंहटाएं
  4. स्थितियों को स्पष्ट करते सटीक विम्ब!

    उत्तर देंहटाएं

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