रविवार, 12 जून 2011

रूपान्तरण [कविता]- अशोक कुमार शुक्ला |साहित्य शिल्पी: Sahitya Shilpi; Hindi Sahitya ki Dainik patrika

रूपान्तरण [कविता]- अशोक कुमार शुक्ला साहित्य शिल्पी: Sahitya Shilpi; Hindi Sahitya ki Dainik patrika

38 टिप्‍पणियां:

  1. कहते कहते वे बहुत कह गये
    मौन दुर्ग थे सिकंदर ढह गये |
    बड़ी जुगत कर जिसने कागद पाया
    पैसे लेकर मौज में खूब धूम मचाया|
    गांव शहर ठाट देखकर जब मुरझाया
    हल्ला बोल उसीपर कोरा कहर ढहाया |
    बड़बोली सहकर भी बोली सह न पाया
    देश क नाम गगन चढ़ा कमाने आया |
    संगठन को कहता कान सभी भन्नाया
    सम्प्रदाय का ढोंग रच विघटन कराया |
    पत्ता साफ कभी हो जाता जांच गर आता
    सद्भावना नाम पे 'मंगल' खूब रास रचाता||

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  2. साहित्यकार हिन्द का साथ निभाएँ
    'मंगल' मंगल भारत की भाषा गाएं|
    जन्मदिन जन्म जन्म का सुख लाए
    साहित्य सृजन में मंगल हाथ बटाये |

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  3. आप ने विचार दी ,मुझमे निखार दी |
    'मंगल' की कामना हमने धन्यवाद दी||
    शुक्ल रामचन्द्र जी ,विशिष्ट कवि को
    नागरीप्रचारणी सभा अपना प्यार दी ||
    संकलन में काव्य गंगा भी दो भाग की
    लगभग पांच सौ कवियों को निखार दी ||

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  4. "आदमी हो तो"
    लेखनी को धार दो
    जीवन सुधार लो |
    कलम गर उठाओ
    समाज को सुधार दो |
    हुनर है तो हॉक दो
    गली मुहल्ला बाँक दो |
    सत्य का साथ दो
    हवा का रुख आंक लो |
    गर आदमी हो तो
    आदमी का साथ दो ||sukhmangal@hmail.com

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  5. खुल गया मिहिर द्वार सत्य का भाई
    तिमिर पार करनेकी जितनी हो लड़ाई|
    लड़ना विरोध चाहे द्वन्द समर जितना
    सत्य मार्ग पर स्थिर निर्भर रह उतना ||

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  6. जब तलक भूखा इंसान रहे
    धरा पर केवल भगवान रहे |
    मानवता मानव की वह रहे
    अब खुशियों का संसार रहे ||

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  8. " लड़ना सीखो"
    कदम बढ़ाके लड़ना सीखो
    सत्य शास्त्र हो पढ़ना सीखो |
    गर् गहर उतरयो तैरना सीखो
    उत्तम जन संग रहना सीखो |
    सज्जन संग संग चलना सीखो
    प्रकृति प्रेम को गहना सीखो |
    छाड़ि आडम्बर बदलना सीखो
    नीक -निम्न सम्हालना सीखो |
    देव् सेव स्वयं साधना सीखो
    सत्य प्रेम बंधन बंध सीखो |
    खल जन हों गढ़ना सीखो
    स्वारथ हरिपद चलना सीखो |
    मिथ्या भाषियों को रदना सीखो
    सुजन संत सा चलना सीखो ||

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  10. तुमने कैसी आग लगाई
    जिसको हमने सुलगाई ।
    दिल में चुपके से कोई
    एक दीपक नहीं जलाई ।
    जलकर ख़ाक हो जाता
    उसकी हमने आग बुझाई ।
    जा !चली गयी दीवानी
    पर देने आई नहीं विदाई ।। 

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  11. तीन लोक की लक्ष्मी ने यह कुटिया बनाई है
    पास कोई न रहने वाला वीर -वंश अपनाई है ||

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  12. तीन लोक की लक्ष्मी ने यह कुटिया बनाई है
    पास कोई न रहने वाला वीर -वंश अपनाई है ||

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  13. शिक्षा में उन्नति दिखती तमाम
    सामाजिक जीवन होगा महान ।
    अधिकारों के लिए कसी कमान
    रूढ़ियों द्वारा होता दिखा अपमान ।
    समाज बढ़ आगे किया सम्मान
    'मंगल 'का देखो कैसा फरमान ।।

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  14. आज नहीं तो कल सही होगा नाम महान
    'मंगल' कहकर चला मस्त सकल जहांन |

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  15. राम भरत कुंड शुभ धाम
    जहां कीन्ह तपस्या राम ।
    श्रीचरणों में करके ध्यान
    राम सबको हैं सुखधाम ।
    धाम यही सबको सुखरासी
    जहां मेला लागे सदा पिचासी।
    अवधपुरी के सुखी नर नारी
    मंगल विदित सकल चहुंवारी ॥

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  16. “मंगल गीत सुनायेंगे ”
    हम वीर भगत की संताने ,
    हो रहे सभी हैं दीवानें |
    वह बात पुरानी छोडो ,
    नव भारत से नाता जोड़ो |
    बिकास मुख मुसुकान ,
    भारत अपना महान |
    अब्दुल हमीद से वीर यहा
    भीम जैसे सूर वीर जहाँ |
    भारत की गाथा गायेंगे
    देश का परचम लहरायेंगे ||

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  17. "कमाल कर दिया "
    एक गुजराती आया
    और कमाल कर दिया
    नदी -नाले तालाब ने
    धमाल कर दिया |
    विश्वविद्यालय और सड़क
    सबके दिन बहुरे
    गंगा की सीढियां बनीं
    वरुणा में जल ठहरे |
    जैसे कि धोती फाड़ के
    कमाल कर दिया
    एक गुजराती आया
    और कमाल कर दिया |
    अपना अपना सबका सपना
    सोया भाग जगा
    होने लगे सच सब सपने
    ऐसा सबको लगा
    जन -जन का सुखी
    होने लगा हिया
    एक गुजराती आया
    और कमाल कर दिया |
    पाक के अंकी- मंकी- डंकी
    नापाकी है सब आतंकी
    उन्हें खोज सब सेना मारे
    काम यही है ढंग की |
    पाक चुभाये काँटा
    भारत भाल कर दिया
    एक गुजराती आया
    और कमाल कर दिया ||

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  19. "परिवर्तन "
    ऐसा हो लिहाफ की समाज बदल देंगे
    कुढ़ रही जिन्दगी जनाब बदल देगे |
    सारा जहाँ सदा परिवर्तन में रहा है
    जनाब दिल- मागो लिवास बदल देंगे|
    मैं नहीं जमाना हमसे है ज़माना
    दुनिया को देख किताब बदल देंगे |
    सभ्यता-संस्कृति में लाते परिवर्तन
    नयी दुनिया का भी हो रहा वर्णन |
    ऐसा हो लिहाफ की समाज बदल देंगे
    कुढ़ रही जिन्दगी जनाब बदल देगे ||

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  20. "जिन्दगी झमेला "
    नाम से जिसके चलता रेला
    करते हो तुम ठेलम ठेला |
    बच्चे करते नहीं झमेला
    लगता जहां -तहां था मेला |
    मार समय की हमने झेला
    दूजा का समझे यह खेला |
    नाम से जिसके चलता रेला
    करते हो तुम ठेलम ठेला ||
    बाजारू बन रहा अकेला
    अपने -पराये ठेलम ठेला |
    ऊँच शिखर -खाई ढकेला
    जा बैठा सिंहासन अकेला |
    मार समाज की खूब झेला
    उसका साथ नहीं अकेला |
    नाम से जिसके चलता रेला
    करते हो तुम ठेलम ठेला ||

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  21. "गाय"
    गाय हमारी माता है सोना जिनसे आता है
    शरीर पुष्ट होता दूधसे मंगल भाग्य विधाताहै|
    दूधोंसे सबल बनाती महल बनवाती सोने से
    रोम में देवता बसते धन्य जीवन विधाता है |....

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  22. कफन ओढ़े चल रहा वह आदमी/ दिखता कुछ और कह रहा है आदमी|
    मजहवी लिवास ओढ़े चल रहा आदमी/ अपने घर से बेघर हो रहा आदमी ||

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  23. दशरथ दरबार में ,
    पहले तो जाइये|
    राम नाम नाम से ,
    नेह को लगाइये||

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  24. दशरथ दरबार में ,
    पहले तो जाइये|
    राम नाम नाम से ,
    नेह को लगाइये||

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  25. शार्दूलविक्रीडित छंद परआधारित प्रयोग - १९मात्राएँ)
    अपने जो देश के लिए जीता है,
    देश क सच्चा मीत होता है|
    जो देशके लिए कल्याण करताहै,
    देश में उसी का नाम होता है|
    उसी का देश में कल्याण होता है,
    जिसने समाज का मान रखता है|
    देश उसीका गुणगान करता है,
    जिसने राष्ट्र का कल्याण किया है|
    समाज को आगे बढ़ाना शान है,
    राष्ट्र का जिससे बढ़ता मान है||

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  27. "काहन कंकड़ "
    ऐसी काही बोली ,काहल काहन सडक प कंकड़ |
    कालि बरसती गोली ,झोली निकले अदभुद पत्थर ||
    छात्रावास समेटे , पेट्रोल बम बोतल व गट्ठर |
    का चुनाव है भाई , चोरी लूट डकैती बत्तर||

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  28. "राष्ट्र धर्म "
    धर्म रक्षा करना मानव काम है |
    धर्म सुरक्षा से होता जन का मान है ||
    धर्म विहीन मनुष्य पशु सामान है|
    जीवित रहकर भी वह वस्तु सामान है ||
    राष्ट्र की रक्षा जीवन क शान है |
    नहीं करे जो राष्ट्र रक्षा प्रतिमान है ||
    गलत क करे विरोध धैर्यवान है|
    गलती का करे समर्थन स्वार्थवान है ||
    राष्ट्र- विरोधक निलज्जवान हैं |
    जो करते राष्ट्र सेवा कीर्तिवान हैं||
    देश में घृणा फैलाए स्वान है |
    विरोधी बात मन में लाए हैवान है ||
    राष्ट्र मर्यादा रखे धैर्यवान है |
    सुदेश के खातिर मर मिटता महान है ||

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  30. "मैं हूँ पेपर ?"
    मैं हूँ पेपर सीधा सादा
    सीधी -साधी अपनी भाषा
    मेरे पृष्ठों पर छपती
    हत्याओं की नित गाथा |
    लूट डकैती औ बलात्कार
    घोटाले की छपती भाषा
    छापा अभी है पड़ने वाला
    पेपर में पहले छप जाता ||

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  31. sukhmangal, your comment is live
    Inbox
    x

    Patrika.Com
    1:45 AM (0 minutes ago)

    to me


    ओबामा ने ओवल ऑफिस में पहली बार मनाई दिवाली

    ओबामा ने ओवल ऑफिस में पहली बार मनाई दिवाली


    patrika.com ·
    \"ज्योति-पर्व \"
    ज्योति -पर्व ,हमरौ संग
    मनवा मितऊ!
    एल० ओ० सी० पे
    दियना जरावाs मितऊ!
    मइया भारती क हिय s
    हुलास लावा मितऊ!
    मन में अँधेरे यदि
    मिटावा मितऊ!
    एक दीपक उजाले क s
    जरावा s मितऊ!
    ह्रदय लिए उमंग
    ताम मिटावा मितऊ!
    हियरा में दियना
    जरावा s मितऊ!
    जगत के अन्धेरा
    भगावा मितऊ!
    सभ्यता -संस्कृति s दीप
    जरावा s मितऊ!
    मार्ग प्रगति क s
    दिखावा मितऊ!
    धरा से अन्धेरा
    मिटावा मितऊ!
    सिमवा पे राउर
    गोली बर्षावा मितऊ!
    पावन -पर्व ,हमरौ संग
    मनावा मितऊ||

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  32. "जन्म दिन हो खुद से सीखें "

    सूरज की किरणों से सीखें ,
    जीवन सदा गुलजार दीखे |
    प्रभु ने दिया वह कम दीखे !
    जिन्दगी हो खुशी सरीखे ||

    साहित्यकार कलम से जूझें ,
    एकादशी दिवस से सीखें |
    'मंगल 'घड़ी साहित्य लूटें,
    मिठाई है मुख में ठूसें||

    धन - खातिर बैंक पे टूटें,
    जनम दिन है खुशियाँ लूटें |
    आँख अपनी कभी न मीचें ,
    राष्ट्र -धर्म क बिगुल फूंकें |
    चकाचौंध हो! खुद से रीझें ,
    एकादशी दिवस से सीखें ||

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  33. "अनमोल जीवन "
    प्रात: दोपहर कीजिये भरके पेट आहार
    नियमित भोजन सदा! रोग न करे विहार |
    रात सदा हल्का भोजन रोग न पकले द्वार
    पैतालीस मिनट बाद जल कोलेस्टोल न प्रहार|
    भोजन कर आप अब चलें पग हजार
    ओझा वैद हाकिम का द्वारे नहीं बहार |
    द्वारे नहीं बहार हो छुट जाए बाजार
    औषधि लेना ही पड़े आयुर्वेद निहार |
    भोजम क्र निहारिये घंटों करलें देर
    औषधि खाने से बचें पानी पीजिये ढेर |
    तिल नारियल घी अलसी सरसों तेल
    शेष दूसरा खायेंगे होगा हार्ट का खेल |
    अन्न मोटा खाइए तन की बढे शक्ति
    संत समझ कीजिये मन में आये शक्ति|
    आहार विहार करके न पीजिये ठंढा नीर
    आँतों में भेदन करे विषधर बनके तीर |
    खट्टा मीठा खाइके जिह्वा हो रणवीर
    डाक्टर!इंजक्सन से छक्के छूटत धीर |
    गेहूं भर चूना ग्लास में लें मिलाय नीर
    पानी पीजिये घुट घुट सुस्ती अपच दूर |
    भोजन करके पाइए खाड़ सौफ अजवान
    पाथर पानी बन जाए मानत सकल जहां ||

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  34. "पाती तो याद आएगी "
    लिखता इसलिए सुपाती जो याद आएगी|
    कुछ देश रहेंन रहें ;मंगल'गीत सुनाएगी |
    त्राहि त्राहि करता जहां ममता को बतलाएगी
    जीवन जीने की कला सबको मिल सिखलाएगी |
    बुद्धि बल से बिल्सित हृदय ज्ञान दिखलाएगी |
    डगर सुनहरा हो अब सबका ऐसा गुर बताएगी|
    अमन चैन चतुरता से रहने वालों को हर्षायेगी|
    भक्ति भाव को भरने की वह कोमलता लाएगी |
    सीधा सादा भोला भाला सुपथी मानव लाएगी |
    ग्यानी-विज्ञानी गुरु ग्यानी से धरा को सजाएगी ||

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  35. "चीख सुनना जरूरी है ,कहो?"
    आतंक फैलाना जरूरी है,कहो?
    अपनों को मिटाना जरूरी है,कहो!
    रक्त रंजित भावना जरूरी ,कहो !
    उद्गम शहर जलाना जरूरी है,कहो !
    नफरत फैलाना जरूरी है ,कहो ?
    सजे मजहवी उत्सव जरूरी है,कहो!
    ताउम्र तनावी सफर जरूरी,कहो !
    क्या माँ को तडपाना जरूरी है,कहो !
    पक्षियों की चीख सुनना जरूरी,कहो !
    राम जानें - संग्राम जरूरी है,कहो ?||

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  36. "कविता कह जाती "
    माँ सरयू की सलिल
    शीतल -निर्मल धारा सी
    व्योम गगन में मचलती
    कविता आगे बढती |
    पारिख पावदान में,
    माथे चन्दन दिखती
    छंदित-रंजित -वंदित
    कलिकाएँ प्रतिबिम्बिब
    कागज- अक्षर- खिलती|
    विचारों के उधेड़ -बून में ,
    लिखने चलती |
    लघु -लम्बी होकर
    भी कुछ वह
    कह जाती ?
    लिख जाती ,
    निज थाती
    मंगल वह कविता,
    कहलाती||

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  37. "स्वच्छता जागरण "
    देश को जगाय दिया ,
    फावड़ा उठाय लिया |
    एक गुजराती लाल ,
    विश्व को उठाय लिया ||
    योग भी अपने लिया ,
    दुनियाभर दिखाय दिया |
    भारत का - सपूत,
    जहां को सीखाय दिया ||
    शान्ति का सन्देश दिया ,
    सभ्यता का मार्ग किया ,
    संस्कृति दिल से लिया ,
    संसार को सिखाय दिया||
    करेंगे और करके दिखाएँगे-
    का तंत्र-मन्त्र चुना |
    देश को समझ लिया ,
    विश्व में फैलाव किया ||

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  38. 'राम को पुकार "
    राम को पुकार !
    माया को मन त्याग ,
    बिगड़ी बनायेंगे ,
    जनत के पालनहार |
    मन ना भरमायेंगे,
    जनम सुफल बनायेंगे ,
    मुक्ति मार्ग दिखाएँगे ,
    रामजी पुकार !!

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