शनिवार, 23 जुलाई 2011

"यह मृत्यु मेरी निजी क्षति है।मै इससे कभी उबर नहीं सकता"


23 जुलाई का दिवस भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन के इतिहास का महत्वपूर्ण दिवस है क्योंकि इस दिन राष्ट्रीय स्वतंत्रता आन्दोलन से जुड़े दो भिन्न विचारधारओं के महत्वपूर्ण व्यक्तियों का जन्मदिवस है। इनमें से पहले है बालगंगाधर तिलक जिन्हें राष्ट्रपिता महात्मा गांधी अपना गुरू मानते थे, वेे आज से ठीक 155 वर्ष पूर्व सन् 1856 में पैदा हुये थे और दूसरे है पं चंद्रशेखर तिवारी जिन्हें हम सब उनके प्रचलित नाम चन्द्रशेखर आजाद के नाम से जानते हैं। इनका जन्म बाल गंगाधर तिलक से 50 वर्ष बाद सन् 1906 में मध्य प्रदेश के भाबरा (झाबुआ) नामक स्थान पर पंडित सीताराम तिवारी और श्रीमती जगरानी देवी के घर हुआ। जनपद उन्नाव का बदरका नामक ग्राम आजाद जी की कर्मस्थली रहा है।

1अमर क्रांतिकारी चन्दशेखर आजाद की स्मृति में अल्फ्रेड पार्क (अब आजाद पार्क) में स्थापित प्रतिमा

यूं तो आजाद जी ने जीविका के लिये 14 वर्ष की उम्र से ही नौकरी प्रारंभ कर दी थी परन्तु एक वर्ष बाद ही शिक्षा ग्रहण करने के उद्देश्य से सन् 1921 में मात्र 15 वर्ष की आयु में पंडित चंद्रशेखर का प्रवास स्थल काशी बना जहाँ रहकर वे महात्मा गांधी के असहयोग आन्दोलन के माध्यम से राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम से जुडे ।



 इस आन्दोलन में सक्रिय भागीदारी के कारण जब किशोर चन्द्रशेखर की गिरफ्तारी हुयी तो उसने पुलिस को अपना नाम ‘‘आजाद’’ बताया। पुलिस को बताया उनका यह नाम उनकी पहचान बन गया। यह इतना लोकप्रिय हुआ कि काशी के ज्ञानवापी की एक सार्वजनिक सभा को सम्पूर्णानन्द जी ने इस बालक ‘आजाद’ की सम्मान सभा के रूप में भी प्रचारित किया तथा अपने संपादन में छपने वाले पत्र ‘‘मर्यादा’’ में इसे प्रमुखता से स्थान भी दिया।
यही संपूर्णानन्द जी कालान्तर में स्वतंत्र भारत के प्रदेश उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री भी बने।


2 1 मार्च 1931 के समाचार की प्रति जिसमें पुलिस मुठभेड में आतातायी की मृत्यु प्रचारित की गयी थी(श्री गोपाल मोहन शुक्ला जी के सौजन्य से)अंग्रेजी सरकार के विरूद्ध सीधी लडाई लडने के पक्षधर चन्द्रशेखर आजाद ने काकोरी काण्ड करने के बाद अपने साथी सरदार भगत सिंह की जान बचाने के लिये इलाहाबाद के बार एट ला पं0 जवाहरलाल नेहरू से फरवरी 1931 आनन्द भवन में संपर्क किया।
इस संबंध में अनेक जनश्रुतियां है कि पुलिस को उनकी उपस्थिति की सूचना किस माध्यम से प्राप्त हुयी? इलाहाबाद पब्लिक लाइब्रेरी के वर्तमान पुस्तकालयध्यक्ष श्री गोपाल मोहन शुक्ला द्वारा इस संबंध में अनेक तथ्यों का व्यौरा जुटाया है। उनका कहना है कि पुलिस मठभेड से ठीक पहले वे इसी थार्नहिल -मायने- मौमोरियल पुस्तकालय जो अब राजकीय पुस्तकालय कहलाता है ,में थे।

3समाचार पत्रों की कतरन जिसमें पुलिस अधिकारियेां के घायल होने का समाचार था

यह भी कहा जाता है कि पुलिस मुठभेड के ठीक पहले वे हिन्दू हास्टल में थे। और उनकी उपस्थिति की सूचना किसी नेतराम नामक व्यक्ति द्वारा दी गयी।

4 पंडित जी की मृत्यु का एक और समाचार

बहरहाल यह सर्वविदित तथ्य है कि जब वे आनन्द भवन में पंडित नेहरू से मिलकर निकले तो इसकी सूचना पुलिस को हो गयी । इसके तक्काल बाद एंल्फ्रेड पार्क में पुलिस ने उन्हें घेर लिया । वे और उनके साथी सुखदेव आदि पुलिस से बचकर भागते रहे और अंत में एक पेड की ओट लेकर सभी साथियों को सुरक्षित भगा देने के बाद अकेली गोली बची रहने पर उसे अपने कनपटी पर दागकर पुलिस के हाथ जिंदा न लगने के अपने प्रण को सार्थक किया।

5पंडित जी द्धारा पुलिस की पकड़ से आजाद होने के लिये उपयोग की गयी माउजर पिस्टल

पुलिस ने इस मुठभेड को उपद्रवियों के हुयी मुठभेड बताकर उनका अंतिम संस्कार कर दिया। बाद में पता लगने पर उनकी अस्थि भस्म के साथ संपूर्ण नगर में यात्रा निकाली गयी जिसमें एतिहासिक भीड एकत्रित हुयी। जिसमें पं0 जवाहरलाल नेहरू संपूणानन्द कमला नेहरू पुरूषोत्मदास टंडन आदि अनेक नेताओं ने भाग लेकर उन्हे भावभीनी श्रंद्धाँजलि अर्पित की।


6 अंग्रेजोे की कैद से आजाद पंडित चंद्रशेखर तिवारी ‘आजाद’(चित्र राष्ट्रीय संग्रहालय के सौजन्य से)

इस अवसर पर महामना पं मदन मोहन मालवीय, तथा मोहम्मद अली जिन्ना ने अपने उद्गारों को इस प्रकार व्यक्त कियाः-
‘‘देश ने एक सच्चा सिपाही खो दिया’’
-मोहम्मद अली जिन्ना
‘‘.....पंडित जी की मृत्यु मेरी निजी क्षति है। मै इससे कभी उबर नहीं सकता.....’’
-महामना पं मदन मोहन मालवीय

4 टिप्‍पणियां:

  1. अच्छी भावाभिव्यक्ति ||

    बधाई ||

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  2. वाकई एक विरासत है आपकी यह पोस्ट. आभार.

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  3. इन महापुरुषों से जुडी अज्ञात सी इन बातों को आपने साझा किया ,शुक्रिया !

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