शनिवार, 10 सितंबर 2011

सिद्धपीठ माँ वाराही में रक्षाबंधन का दिन..

श्रावण मास की पूर्णिमा का दिन जहाँ समूचे भारतवर्ष में रक्षाबंधन के रूप में पूरे हर्षोल्लास के साथ बहनों का अपने अपने भाई के प्रति स्नेह के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है वहीं हमारे देश में ऐक स्थान ऐसा भी है जहाँ इस दिन सभी बहनें अपने अपने भाइयों को युद्ध के लिये तैयार कर युद्ध के अस्त्र के रूप में उपयोग होने वाले पत्थरों से सुसज्जित कर विदा करती हैं। यह स्थान है उत्राखण्ड राज्य का सिद्धपीठ माँ वाराही का देवीधुरा स्थल। इस बार के ग्रीष्मावकाश मे वहाँ जाने का अवसर मिला सो यहाँ की कुछ अनोखी परंपराओं केा आपके साथ बाँट रहा हूँ।
चित्र-1 देवीधुरा कस्बे का विहंगम दृष्य


उत्राखण्ड राज्य में प्रवेश करने के लिये तराई श्रेत्र में स्थित अनेक प्रवेश द्धारों मे से एक टनकपुर से आगे बढने के साथ ही जहाँ आपको ठेठ पर्वतीय संस्कृति के दर्शन मिलने लगते हैं वहीं प्राकृतिक दृष्यों की मनमोहनी छटा भी देखने को मिलती है । टनकपुर से प्रसिद्ध सीमान्त जनपद पिथौरागढ़ जाने के लिये राष्ट्रीय मार्ग एन एच 09 पर लगभग अस्सी किलोमीटर दूर स्थित है कस्बा लोहाघाट । लोहाघाट से साठ किलोमीटर दूर स्थित है शक्तिपीठ माँ वाराही का मंदिर जिसे देवीधुरा के नाम से जाना जाता हैं।


चित्र-2माँ बाराही की गुफा का उत्तरी प्रवेश मार्ग

इस मार्ग से यात्रा आरंभ करना बड़ा सुखद लगता है बडा दुरूह लते जाने के मार्ग में इस जनपद मुख्यालय से लगभग अस्सी किलोमीटर दूर एक स्थान है देवीधुरा । समुद्रतल से लगभग अट्ठारह सौ पचास मीटर (लगभग पाँच हजार फिट) की उँचाई पर स्थित है । यह शक्ति पीठ है तथा इसे भगवान विष्णु के दशमअवतारों में तीसरे अवतार बाराह के लिये जाना जाता है।



चित्र-3 गुफा में प्रवेश का दक्षिणी मार्ग
ऐसी मान्यता है कि सृष्टि के पूर्व सम्पूर्ण पृथ्वी जलमग्न थी तब प्रजापति ने बाराह बनकर उसका दाँतो से उद्धार किया उस स्थिति में अब दृष्यमान भूमाता दंताग्र भाग में समाविष्ट अंगुष्ट प्रादेश मात्र परिमित थी । ‘‘ओ पृथ्वी! तुम क्यों छिप रही हो?’’ ऐसा कहकर इसके पतिरूप मही बाराह ने उसे जल मे मघ्य से अपने दन्ताग्र भाग में उपर उठा लिया । यही सृष्टि माँ बाराही हैं।


चित्र-4 मंदिर परिसर में रखीं बग्वाल (पत्थर मार युद्ध) में बचाव के उपयोग में लायी जाने वाली ढालें

देवीधुरा में सिद्धपीठ माँ वाराही के मंदिर परिसर के आस पास भी पर्यटकीय दृष्टि से महत्वपूर्ण अन्य स्थलों में खोलीगाँड, दुर्वाचौड, गुफा के अंदर बाराही शक्ति पीठ का दर्शन, परिसर में ही स्थित संस्कृत महाविद्यालय परिसर, शंखचक्र घंटाधर गुफा, भीमशिला और गवौरी प्रवेश द्वार आदि प्रमुख हैं।


चित्र-5 बग्वाल (पत्थर मार युद्ध) का स्थल
प्राचीन काल से चली आ रही यहाँ की एक स्थापित परंपरा के अनुसार माँ बाराही धाम में श्रावणी पूणिमा (रक्षाबंधन के दिन) केा यहाँ के स्थानीय लोग चार दलों में विभाजित होकर (जिन्हे खाम कहा जाता है, क्रमशः चम्याल खाम, बालिक खाम, लमगडिया खाम, और गडहवाल,) दो समूहों में बंट जाते हैं और इसके बाद होता है एक युद्ध जो पत्थरो को अस्त्र के रूप में उपयोग करते हुये खेला जाता है।

चित्र-6 बग्वाल (पत्थर मार युद्ध) का स्थल
इस पत्थरमार युद्ध को स्थानीय भाषा में ‘बग्वाल’ कहा जाता है। यह बग्वाल कुमाँऊ की संस्कृति का अभिन्न अंग है। श्रावण मास में पूरे पखवाडे तक यहाँ मेंला लगता है। जहाँ सबके लिये यह दिन रक्षाबंधन का दिन होता है वहीं देवीधुरा के लिये यह दिन पत्थर-युद्ध अर्थात बग्वाल का दिवस होता है।
चित्र-7 भीम शिला
बढती व्यवसायिकता ने कुमाँऊ की संस्कृति की इस प्रमुख परंपरा ने अपनी चपेट में ले लिया है जिसका जीता जागता उदाहरण मुख्य बग्वाल स्थल (पत्थर मार युद्ध स्थल ) के ठीक बीचों बीच लगा एक होर्डिग है जिसे लगाया तो गया है, देवीधुरा मेले में आने वाले दर्शनार्थियों के स्वागत पट के रूप मे परन्तु इस होर्डिग पर प्रायोजकों के विज्ञापन के साथ यह स्वागत संदेश छोटे छोटे शब्दों में ठीक उसी तरह लिखा हुआ प्रतीत होता है जैसा सिगरेट की डिब्बियों पर लिखा हुआ चेतावनी संदेश।

चित्र-8 व्यवसायिकता की चपेट में बग्वाल (पत्थर मार युद्ध) का मुख्य स्थल
स्थानीय लोगों ने बताया कि पत्थर मार युद्ध के दौरान स्वागत संदेश जगह जगह से फट गया है परन्तु आश्चर्य यह देखकर होता है कि बग्वाल का एक भी पत्थर इस स्वागतपट में अंकित प्रायोजक के विज्ञापन वाले भाग को क्षतिग्रस्त नहीं कर सका है।

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