चित्र 1 पुण्यागिरि मां दर्शन मार्ग
प्रातःकाल उठकर स्नानादि से निवृत होने के बाद जब आगे के मार्ग के बारे में पड़ताल की तो मालूम हुआ कि
बीती रात पहाड़ो पर हुयी बारिश के कारण टनकपुर से माँ पुण्यागिरि के मंदिर तक के लगभग बीस किलोमीटर के मार्ग में दो तीन स्थानों पर बड़ी बड़ी चट्टाने तथा दलदली अवरोध आ गये हैं जिनमें एक बस यात्रियों सहित फंस गयी थी जिसे बड़े प्रयासों के बाद निकाला जा सका है। स्वाभाविक तौर पर टनकपुर से आगे का मार्ग वाहनों के लिये प्रतिबंधित कर दिया गया है। बड़ी संख्या में श्रद्धालु पैदल ही देवी माँ के दर्शनों हेतु आगे बढ़ रहे थे।

चित्र2 उत्तराखंड की आरंभिक पहाड़ियों की तलहटी में बसा कस्बा टनकपुर
यह नजारा देख एक बार मंदिर की यात्रा को टालने की इच्छा हुयी परन्तु संयोग से जनपद जे0पी0नगर से आये मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट श्री रामनारायण जी नजर आये। वे भी बच्चों सहित माँ के दर्शन की इच्छा से वहाँ आये थे परन्तु ऐसी हालात देखकर वे भी जाने का उपक्रम बना रहे थे। हम दोनो के परिवारों को असमंजस में देखकर चैकिंग पर तैनात पुलिस अधिकारी ने स्थानीय थाने के दो सिपाहियों को बुलाकर बीच के मार्ग में फंसे छोटे वाहन जीप की व्यवस्था करवाते हुये कहा कि:- ‘अब जब आप लोग दर्शन की इच्छा से आये हैं तो विना दर्शन के जान उचित न होगा।’’
चित्र 3 भूस्खलन के कारण क्षतिग्रस्त पुण्यागिरि दर्शन मार्ग
इसके बाद स्थानीय पुलिस की सहायता से हम दोनो के परिवार लगभग आठ किलोमीटर की यात्रा जीप से करने के बाद उस स्थान पर पहुँचे जहाँ भारी मात्रा में दलदली मलबा आने से मार्ग अवरूद्ध हो गया था । लगभग पाँच सौ मीटर की यह यात्रा पैदल करने के बाद हमें फिर एक और जीप मैं बैठकर कुछ किलोमीटर की यात्रा करनी थी। अबकी बार वह जीप हमें पुलिस चौकी टुलीगाढ़ तक ले आयी । यहाँ भी कुछ मीटर पैदल चलने के बाद एक और जीप हमें भैरवघाटी तक ले गयी। सामान्य परिस्थितियों में यहाँ तक आवागमन का साधन उपलब्ध रहता है ।
चित्र 4 क्षतिग्रस्त मार्ग से गुजरते दर्शनारर्थीगण
यहाँ से माँ के मंदिर तक की लगभग चार किलोमीटर की यात्रा चढ़ाइ्र भरे मार्ग पर पैदल ही पूरी करनी थी । पूरे मार्ग में जगह जगह यात्रियों के ठहरने के विश्राम स्थल बने थे जहाँ सुकून से बैठकर कुछ देर विश्राम करने के उपरांत फिर आगे बढ़ना होता था। भैरवघाटी से नाईबाडे तक की यात्रा में अनेक दुकानो पर लिखा मिला कि यह आखिरी दुकान है परन्तु वह आखिरी नहीं थी । यह लिखे जाने का आशय मेरी समझ से परे था।
चित्र 5 ठूलीगाड पुलिस रिपोटिंग चौकी जहां से पैदल यात्रा मार्ग प्रारंभ होता है
धीरे घीरे चढ़ते हुये अंत में एक चट्टानी पहाड पुण्यागिरि आया जिसके शीर्ष पर माता का मंदिर स्थित है। वहाँ तक पहुँचने के लिये चट्टान को काटकर एक संकरा मार्ग बनाया गया है जिसे दो भागों में विभाजित किया गया है जिससे दर्शन हेतु जाने वाले और दर्शनों के उपरांत लौटने वाले दर्शनार्थियों का मार्ग पृथक पृथक हो जाता है इससे चढने और उतरने वाले दर्शकों के लिये सुविधा रहती है।
चित्र 6 सिद्ध पीठ मां पुण्यागिरि मंदिर प्रवेश मार्ग
इस चढाई के मार्ग पर धर्ममत्नी का हाथ थामें जब मैं शीर्ष पर स्थित माँ के मंदिर तक पहुँचा तो असीम आनंद की प्राप्ति हुयी। यह स्थल एक चट्टानी पर्वत पुण्यागिरि के शीर्ष पर अधिकतम् पाँच गुणे दस का चौरस स्थल के रूप में है जिस पर एक गर्भस्थल के उपर शक्तिरूपिणी माँ का एक छोटा सी मंदिर बना है । यहाँ चट्टान के शीर्ष पर स्थित इस मुख्य मंदिर में बामुश्किल दस से बीस लोगों के खडे रहने लायक ही स्थान है।
दर्शन और पूजापाठ करने के उपरांत हमने वापिस भैरव घाटी की ओर यात्रा आरंभ की । अब तक आसमान में बादल फिर से छा चुके थे। इस कारण सूरज की चिलचिलाती धूप हमारी यात्रा में खलल डालने नहीं आ सकती थी।
चित्र 7 मंदिर के पैदल प्रवेश मार्ग पर दर्शनों को जाते दर्शनारर्थीगण
लौटते हुये मार्ग के बीच में काली माँ का एक मंदिर के रूप में एक छोटी विश्राम स्थली हैं जहाँ रूककर काली माँ को भेट स्वरूप बलि के प्रतीक के रूप में नारियल फोडे जाने का विधान है। यह नारियल काली माँ की मूर्ति के समीप इस निमित्त बनी एक चट्टान पर पर पटककर फोडा जाता है। नारियल से लिकलने वाले जल को काली माँ को अर्पित करने के बाद एक काल झंडा तथा काली उरद की खिचडी चढाई जाती है। सभी तीर्थ यात्री इसे एक परंपरा के रूप में स्वीकार करते हुये ऐसा करते हैं।
चित्र 8 पर्वत के शिखर पर स्थित मां पुण्यागिरि के मंदिर का विहंगम द्वष्य
मैने परंपरा का निर्वहन करने के साथ थोडा सा तार्क्रिक होते हुये यह पूछने की जुर्रत की कि यह परंपरा क्यों है परन्तु मंदिर में उपलब्ध पंडितजी , दुकान लगाकर यह सामग्री बेचने वाले ढेरों दुकानदारों में से कोई भी इसका उत्तर नहीं दे सका। मेरा मानना है कि किसी भी धर्मस्थल पर निर्धारित कोई भी परंपरा अनायास नहीं होती , उसके पीछे कोई न कोई तार्किक आधार अवश्य होता है सो आप सभी सुधी पाठकों के लिये इसका उत्तर खोजने का विकल्प सुरक्षित करते हुये नाईबाडा से अपनी यात्रा के अगले पडाव भैरव घाटी की ओर बढ चले।
चित्र 10 मां पुण्यागिरि के मंदिर के गर्भग्रह प्रांगण का विहंगम द्वष्य
भैरो घाटी में काल भैरव के दर्शनों को बगैर यात्रा को अधूरी मानी जाती है। इसके दर्शन करने के बाद टुलीगाड पुलिस चौकी पहुँचे तब तक हलकी हलकी बूंदा बांदी होने लगी थी और फिर वहाँ से वही दलदली मलबे वाला मार्ग , बीच में फंसे छोटे वाहनों का चक्कर लगाने का दौर और अंततः हम वापिस टनकपुर आ गये। यहाँ पहुँचकर जे0पी0नगर से आये मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट श्री रामनारायण जी व उनके परिवार से विदा ली जिन्हे रात्रि में ही बरेली निकल जाना था। मैं अपने परिवार सहित रात्रि विश्राम हेतु स्थानीय विश्राम गृह में आ गया और अगली सुबह जल्दी निकलने के बारे में सोचते हुये जल्दी से बिस्तर तक जा पहुँचा क्योंकि अगला दिन हमारे विवाह की इक्कीसवीं वर्षगांठ का दिन जो था।
जय माँ की बोलता चल, चढाई चढता चल। जय माता दी।
जवाब देंहटाएंबचपन में बहुत गया हूँ ...
जवाब देंहटाएंहार्दिक शुभकामनायें आपको !
सुन्दर प्रस्तुति |
जवाब देंहटाएंइस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
जवाब देंहटाएंbahut achchha yatravartant..
जवाब देंहटाएंland sliding pahad ki jwalant samsya...
aap meri post par aaye aapka hardhik dhanyavaad...