रविवार, 9 अक्टूबर 2022

समय के साथ किसी की भी सीरत उसकी सूरत से झलकने लगती है..

कल मालिक मोहम्मद जायसी का जन्म दिवस था..!
जायस नगर के कस्बे कंचाना में इनका जन्म हुआ था। जहाँ ये पैदा हुए थे उस स्थान पर अब लखौरी ईंटों से बनी दीवारो के चंद अवशेष ही बचे हैं। कहते हैं कि मालिक के बचपन में उन्हें कोई भयंकर रोग हुआ जिससे निराकरण के लिए उनकी माँ ने किसी पीर से मनौती मानी।उस पीर की दुआ के बाद बालक का जीवन तो बच गया लेकिन उनका शरीर विकृत हो गया, उनकी एक आँख चली गयी, बांया कान भी नाकाम हो गया। यह महान कवी जब शेरशाह के दरबार में गया तो बादशाह इनकी विकृत स्थिति और कुरूप चेहरा देखकर हंस दिया। उस हंसी का जवाब जायसी ने बादशाह से यह पूंछकर दिया-
ष्तू मुझ पर हंसा या उस कुम्हार पर जिसने हम सबको बनाया है..ष्
इस पर शेरशाह ने लज्जित होकर क्षमा मांगी..।
..लेकिन जायसी जी की जो एकमात्र तस्वीर प्रचारित है वह एक सुन्दर युवक की तस्वीर है ।
सही कहा गया है ...
समय के साथ किसी की भी सीरत उसकी सूरत से झलकने लगती है..!

शनिवार, 1 अगस्त 2020

ZEAL: सोमनाथ मंदिर

ZEAL: सोमनाथ मंदिर: सोमनाथ मंदिर के लिए डा. राजेंद्र प्रसाद को बड़ी कीमत चुकानी पड़ी ये जगजाहिर है कि जवाहल लाल नेहरू सोमनाथ मंदिर के पक्ष में नहीं थे. म...

सोमवार, 24 दिसंबर 2018

लव यु प्रभु यीशु, अटल जी एंड मालवीय जी..!



आदरणीय मित्रों, शुभप्रभात..!
#पोस्टिंगनामा

युगपुरुष अटलबिहारी बाजपेई और मदन मोहन मालवीय दोनों का जन्म आज ही के दिन हुआ था...1861 में जन्मे पंडित मदन मोहन मालवीय जी ने 1907 में एक साप्ताहिक पत्र "अभ्युदय" आरम्भ किया था जिसके फरवरी 1946 अंक में 21 वर्षीय नवयुवक अटल जी द्वारा लिखी एक कविता को उन्होंने मुखपृष्ट पर स्थान दिया था ....
"जला नहीं प्रहलाद, होलिका क्षार हो गयी क्षण में
सुनो प्रलय की अगवानी का स्वर उनचास पवन में"
अटल जी लखनऊ से सांसद रहे और मैं लखनऊ का मतदाता..! इसके अतिरिक्त मैं उन सौभाग्यशाली अधिकारियो में से एक हूँ जिन्हें तत्कालीन सांसद और प्रधानमन्त्री अटल बिहारी बाजपेई के विकास क्षेत्र में काम करने का अवसर मिला है।
मुझे याद है कि लखनऊ के लिए उनकी महत्वकांक्षी परियोजनाओ में से एक सर्कुलर ट्रेन चलाने की भी थी जिसके लिये चारबाग से ऐशबाग लखनउ सिटी डालीगंज आदि के मध्य एक घनी आबादी वाला क्षेत्र सुभाष मार्ग मुंगफली मंडी का था जिसे खाली कराने में हमें लोहे के चने चबाने पड़े थे।
इस पूरी मुहिम के दौरान अटल जी के प्रतिनिधि श्री शिव कुमार जी हम लोगों का मार्गदर्शन करते रहते थे।
अटल जी के जन्म दिवस पर उनका स्मरण करते हुये पंडित मदन मोहन मालवीय जी को नमन.. साथ ही स्मरण प्रभु यीशु को भी जिनका अवतरण इस धरती पर होने के साथ ही रात ने छोटा होना आरम्भ कर दिया और यह दिन कहलाया ......"बड़ा दिन......"
लव यु प्रभु यीशु, अटल जी एंड मालवीय जी..!

सोमवार, 7 मई 2018

उनके लिखे से प्रभावित हुये बगैर रहा ही नहीं जा सकता..!

शायद कोई पांच एक साल पुरानी बात है, किसी समारोह में स्मृति चिन्ह के रूप में दयानन्द पाण्डेय जी का उपन्यास 'बांसगांव की मुनमुन' मिला। उपन्यास पढकर में मुनमुन का फैन तो हुआ ही उसकी मां दयानन्द पाण्डेय का भी फैन हो गया। । चौंकिये नहीं ....! कोई गलती नहीं हुयी ...मैने सच कहा कि मुनमुन की मां दयानन्द पान्डेय जी ही है ऐसा स्वयं पान्डेय जी ने ही कहा है कि
''...जब मैं लिखता हूं तो मां बन जाता हूं। अनायास । रचना जैसे मेरे लिखने में आ कर बच्चों की तरह झूम जाती है । खिलखिलाती मिलती है । रचना में समाये पात्र चौकड़ी भरते हैं बच्चों के दोस्तों की तरह । कभी बात मान जाते हैं , कभी नहीं मानते । बहुत बार मेरे हाथ में नहीं आते । अपने मन से जो चाहे करते रहते हैं । और मैं एक मां की तरह उन के पीछे-पीछे लगा रहता हूं। उन को सजाता, संवारता और दुलराता हुआ।..''
.....सचमुच
आज श्री दयानन्द पाण्डेय जी की लिखी एक सच्ची कहानी मन्ना जल्दी आना का यह अंश साझा कर रहा हूं जिसे पढकर आप भी इस पूरी कथा को अवश्य पढना चाहेंगे :-
वह परिवार व्यवसाई था और शफी ने अपने रसूख के दम पर उन के बिजनेस को ख़ूब प्रमोट करवाया। कोई दिक्कत नहीं थी। अब तक उस महिला से शफी के सरोकार काफी ‘प्रगाढ़’ हो चले थे। हालां कि शफी शादीशुदा थे पर उन की अनपढ़ जाहिल पत्नी तराई के उन के गांव में रहती थी। शफी पहले तो उस के लिए भागे-भागे गांव पहुंचते थे, लेकिन तब लड़कपन था। पर अब तो वह उस की चर्चा तो दूर अपने को कुंवारा ही फरमाते। बाद में जब उन का इस शहर में भी वापस आना हुआ तो भी उन्होंने उस परिवार
से नाता नहीं तोड़ा। प्रगाढ़ ही रखा। बल्कि उस परिवार का आना जाना बाद में इस शहर में भी हो गया। बाई प्लेन। सारे खर्चे-बर्चे शफी उठाते। इस आने जाने के बीच उस हिंदू परिवार की मालकिन की दो बेटियां भी बड़ी होने लगीं। एक बेटी अंजू तो बला की ख़ूबसूरत थी। वह बोलती थी तो लगता जैसे मिसरी फूट रही हो। उस की कानवेंटी हिंदी अजीब-सा कंट्रास्ट घोलती। चलती तो लगता जैसे किसी फूल की कली फूट रही हो। उस के होंठ भी बड़े नशीले थे। और आंखें तो ऐसी गोया ख़य्याम की रुबाई हों। उस की शोख हंसी से लोगों के दिलों में मछलियां दौड़-दौड़ जातीं। तो ऐसे में शफी कौन से ब्रह्मचारी थे ? वह कैसे न फि होते इस अंजू नाम की लड़की पर। क्यों न मर मिटते उस पर ! भले वह उन की माशूका की बेटी थी। तो क्या, शफी ने भी रूसी उपन्यास ‘लोलिता’ पढ़ रखा था। फिर पड़ गए वह भी इस अंजू रूपी लोलिता के कपोलों के किलोल में। उस के कपोलों पर लटकती जुल्फों के असीर हो गए। बतर्ज मीर ’हम हुए तुम हुए कि मीर हुए, सब इसी जुल्फ के असीर हुए।’
उनके लिखे से प्रभावित हुये बगैर रहा ही नहीं जा सकता।
अंजू भी सोलह-सत्तरह के चौखटे में थी। सेक्स के पाठ में जल्दी ही प्रवीण हो गई शफी के साथ। शफी के हाथ क्या पड़े उस पर कि उस की रंगत ही बदल गई। देह उस की गदराने लगी। अंजू की मां को कुछ-कुछ भरम-सा हुआ, शक-शफी पर भी गया पर जब तक शक पक्का होता हवाता बात बहुत आगे बढ़ चुकी थी। अंजू शफी के बच्चे की मां बनने वाली थी। अब क्या करे अंजू ? क्या करे अंजू की मां ? बात अंजू के पिता तक पहुंची। उन्हों ने माथा पीट लिया। बोले, ‘मुह काला करने के लिए इसे मुसलमान ही मिला था ?’ अब उन्हें कौन समझाता भला कि यह मुसलमान उन के घर में बरसों से सेंध लगाए पड़ा है। कौन बताता उन्हें कि बेटी तक तो वह बाद में आया, पहला पड़ाव तो मां बनी जो आप की बीवी है। आप की बीवी ही पुल बनी आप की बेटी तक शफी को पहुंचाने में। लेकिन बिजनेस प्रमोट करवाने के चक्कर में आप की आंख बंद रही तो कोई क्या करे भला ?
ख़ैर अंजू के मां बनने की ख़बर से पूरा घर तबाह था। अगर कोई निश्चिंत था तो वह खुद अंजू थी। शफी ने सपनों के ऐसे शहद चखा रखे थे अंजू को, प्यार के ऐसे पाठ पढ़ा रखे थे अंजू को, कि उसे कोई फिक्र होती भी तो कैसे ? जिंदगी के थपेड़ों की उसे थाह भी नहीं थी। वह तो अपनी ख़ूबसूरती की चाश्नी में मकलाती फुदकती रहती।
अंततः मां ने पहल की पूछा, अंजू से, ‘तू क्या चाहती है ?’
‘किस बारे में ?’ अंजू चहकती हुई प्रति-प्रश्न पर आ गई।
‘इस बच्चे के बारे में।’ मां ने साफ किया, ‘तेरे होने वाले बच्चे के बारे में?’
‘जैसा शफी साहब कहेंगे !’ वह फिर चहकती हुई बोली।
‘तुम ने कोई बात की है इस बारे में शफी से ?’
‘नहीं, बिलकुल नहीं।’
‘करेगी भी ?’
‘जरूरत क्या है ?’
‘जरूरत है।’ मां बोली, ‘मैं ट्रंकाल बुक करती हूं। बात तू कर !’
‘जल्दी क्या है अभी ?’ अंजू बोली, ‘अगले हफ्ते तो वह आने वाले हैं?’
‘कौन आने वाले हैं ?’
‘शफी साहब !’ अंजू यह कहती हुए लिरिकल हो गई।
‘अगले हफ्ते तक नहीं रुक सकती मैं।’ मां बोली, ‘तू आज ही बात कर!’
‘तो तुम ट्रंकाल बुक करो मम्मी !’
फोन पर बात के बाद मां ने अंजू से पूछा, ‘तो फिर ?’
‘ओह मम्मी !’ अंजू मां के गले में बाहें डालती हुई बोली, ‘डोंट वरी, वह शादी के लिए तैयार हैं !’
‘कौन शादी के लिए तैयार हैं ?’ मां ने चकराते हुए पूछा।
‘शफी साहब !’ अंजू इतराती हुई बोली, ‘और कौन शादी के लिए तैयार होगा?’ वह अपने पेट पर हाथ रखती हुई बोली, ‘जिस का बच्चा है वही तो तैयार होगा !’
‘ओफ्फ !’ कह कर मां ने माथे पर हाथ रख लिया। बोली, ‘तुझे पता है कि शफी तुझसे दोगुनी उमर से भी ज्यादा का है ?’
‘पता है मम्मी।’ वह बोली, ‘दिस इज नाट माई प्राब्लम !’ उस ने जोड़ा, ‘माई प्राब्लम इज दैट आई लव हिम !’ मां का मन हुआ कि अंजू को बताए कि तुझे पता है, तेरा शफी मुझ से भी लव करता रहा है ? पर यह सवाल वह पी गई। बतातीं भी तो कैसे बतातीं, बेटी से भला यह और ऐसी बात !
शफी ने सचमुच अंजू से शादी कर ली। शहर में यह बात तेजी से फैली कि शफी ने एक नाबालिग हिंदू लड़की को भगा फुसला कर शादी कर ली ! इस शादी की हवा इतनी तेज बही शहर में कि एक बार तो हिंदू-मुस्लिम फसाद की नौबत आ गई।
कहानी का लिंक टिप्पणी में दे रहा हूं। अवश्य पढियेगा इसे...!

मंगलवार, 5 सितंबर 2017

शिक्षक दिवस पर गुरु घंटाल को भी नमन

जीवन यात्रा से बड़ा कोई शिक्षक नहीं है। सो आज का विशिष्ट नमन जीवन यात्रा के उन अनुभवों को जो कड़वे होने के कारण सबसे अच्छे शिक्षक सिद्ध हुए।
जीवन यात्रा के प्रारम्भिक चरणों का ऐसा अनुभव जो याद आ रहा है वो कक्षा सात के आसपास का है। स्थान वही पौड़ी का डी ऐ वी कालेज....
सहपाठियों में कई नाम अच्छे थे लेकिन एक नाम था सलिल.....जी हाँ ..! शायद सलिल ही नाम था उसका...!
मैं नया नया प्रभावित हुआ था उसके लंबे बालों को देखकर..!
कॉपी पर लिखते हुए उसके बाल आँखों पर आ जाते तो वह बड़ी स्टाइल से सिर को झटक कर उन्हें वापिस अपने सिर पर ले आता । उसे न होम वर्क की चिन्ता रहती और न ही कापियों के कवर फटने की..! 
वो कक्षा में पीछे की सीट पर बैठता था और मैं अगली पंक्ति में।सलिल जी से मुलाक़ात जा संयोग कुछ इस वजह से बना कि विद्यालय में किन्ही बड़े अफसर का निरीक्षण होना था सो अगली पंक्ति में बैठने वालो को पीछे की पंक्तियों में अलग अलग स्थान पर समायोजित किया गया था ताकि निरीक्षणकर्ता को पिछली पंक्तियों में भी होमवर्क पूरा करने वाले अच्छे छात्रो का आभास मिल सके।
उस निरीक्षण का क़िस्सा फिर कभी सुनाऊंगा लेकिन आज सलिल के साथ बितायी एक दोपहर बताना चाहता हूँ जब उसके आभामंडल से आकर्षित होकर मैं उसके साथ मध्यावकाश में कालेज से काफी दूर जंगल की और निकल गया था। 
कंडोलिया से सिविल लाइन्स आने वाले मोटर मार्ग के मध्य में ही एक स्थान पर एक टाकीज था जिसे फट्टा टाकीज कहा जाता था। वह स्थान लगभग निर्जन था। वही पर दो बड़ी चट्टानों के बीच एक ऐसा स्थान था जहाँ कोई हमें देख नहीं सकता था। 
उस निर्जन स्थान पर पहुँच कर सलिल ने अपनी जेब से दो अधजले सिगरेट के टोटे निकाले और एक मुझे पकड़ा कर दुसरा स्वयं सुलगा लिया। आसमान की ओर देखकर आँखे बंद करके एक लंबा कश लिया और कुछ देर बाद स्टाइल के साथ धुंवा छोड़कर बोला-
"तुम भी इसी तरह कश लगाओ ...बड़ा मजा आता है..!"
मैंने कई बार प्रयास किया लेकिन उस अधजली सिगरेट को सुलगा नहीं सका तो उसने अपना वाला टुकड़ा मुझे दिया और ओंठो से लगाकर सांस अंदर खींचने को कहा।
मैंने ऐसा ही किया और अगले ही पल खांसी का एक तेज झटका आया और आँखों से पानी निकल आया।
वो बोला-
"अबे ....! इतनी तेज खींचने को थोड़े ही बोला था..! आराम से खींच..स् स् याया ले...!"
लेकिन मेरी हिम्मत न हुई कि मैं एक बार और ऐसा विषाक्त धुंवा अपने फेफड़ों तक खिंच सकूँ।
आज सोचता हूँ कि ईश्वर मेरे प्रति कितना दयालु था कि उसने मेरे लिए सिगरेट के इस पहले अनुभव को इतना कड़वा बना दिया कि आगे कई वर्षो तक मैं दुवारा सिगरेट पीने की सोच भी नही सका। 
....यदि ईश्वर दयालु न होता तो वो पहला कश हल्का होता और आनन्ददायी होता तो शायद मै भी इस बुरी आदत का शिकार बन गया होता.....!
शिक्षक दिवस पर उस "बाल गुरु घंटाल" को भी नमन....

मंगलवार, 11 जुलाई 2017

फेसबुक..नशा..!

कल भी-
चुपके से आयी थी वो
मेरी पोस्ट पर 
और लाइक दबाकर चली गयी
कुछ भी नहीं बोली....
मैंने देखा था
अपनी पोस्ट पर
वो ब्लू एक्टिव लाइक,
महसूस भी किया था
अपने चेहरे पर
तुम्हारी उंगलियो के पोरों सा,
लेकिन जाने क्यों.?
चन्द पलों बाद
कुछ सोचकर
फिर लौटी थी तुम
उसी ब्लू ऐक्टिव लाइक को छूने
एक बार फिर
तुम्हारे छूते ही
गायब हो गया था
वो ब्लू एक्टिव लाइक
जानती हो
फेसबुक की
आभासी दुनिया से दूर
शरमा कर वो दुबक गया है
मेरे अंतस्थल में..!
फिर से बताता हूँ-
लोगों को चढ़ता होगा..नशा..!
मुझे तो तुम चढ़ी हो
...
प्रिये..!

मंगलवार, 4 जुलाई 2017

यकीन है मुझे...!

 वादा था... 
 सिर्फ प्रेम लिखूंगा..! 
 लेकिन 
 कैसे लिख सकूँगा..? 
 जब 
 अपने कमरे में 
 रस्सी के फंदे पर 
 झूलता मिला हो 
 कोई पहरुआ..? 
 जब आँखों के सामने 
 टूटे पड़े हों कुछ सपने..? 
 गौर से देखो मित्रों 
 उसी कमरे में मिलेगा- 
 टूटा हुआ भरोसा..! 
 मिलेगी सिसकती हुई आस...! 
 और शायद.. 
 मिल जाए 
 भटकी हुई व्यवस्था भी...! 
 अब सोचो- 
 ऐसे में कैसे निभेगा ? 
 सिर्फ प्रेम लिखने का वादा..! 
 फिर भी- 
 यकीन है मुझे 
 कि- 
 मैं सिर्फ 
 प्रेम ही लिखूंगा.!

शनिवार, 1 जुलाई 2017

जादू...!

सुबह उठते ही
ताजे हवा के झोंके की आस में
खिडकी खोल दी
लेकिन यह क्या....?
ताजी हवा के साथ
चेेहरे से टकरायी
ठंडी फुहार
और जादू देखिये
भीग गया मन
सचमुच लोगो को तो नशा चढता है
लेकिन
मुझे तुम चढी हो ....प्रिये !

सोमवार, 20 मार्च 2017

आचार्य जी का पुण्य स्मरण और योगी आदित्यनाथ को शुभकामनाएं...!


1947 में आजादी मिलने के साथ ही उत्तराखंड से एक साप्ताहिक पत्र का प्रकाशन आरम्भ हुआ नाम था "युगवाणी" इसे आरम्भ किया था आचार्य गोपेश्वर कोठियाल ने...!
आज आचार्य जी की पुण्यतिथि है.. 19 मार्च 1999 को उनका निधन हुआ था और उसके ठीक दस दिन बाद 29 मार्च 1999 को भयंकर भूकंप आया था...जिसमें आचार्य जी का ग्राम उदखण्डा बुरी तरह क्षतिग्रस्त हुआ था..।
तब उनके पुत्र संजय कोठियाल Sanjay Kothiyal के साथ इस दुरूह ग्राम उदखण्डा तक की यात्रा की थी ...। आचार्य जी के न रहने के बाद संजय जी " युगवाणी" पत्रिका का निरंतर प्रकाशन कर रहे हैं..
एक और उत्तराखंडी अजय सिंह बिष्ट ने कल उत्तर प्रदेश में नया इतिहास रचा है ...जब उसे प्रदेश का मुख्यमंत्री चुना गया...जी हाँ..! योगी आदित्यनाथ के रूप में पहचाने जाने वाले दरअसल अजय सिंह बिष्ट हैं जो 1991 में कोटद्वार महाविद्यालय में छात्रसंघ का चुनाव बुरी तरह हारने के बाद दुखी होकर अपने मामा महंत अवैद्यनाथ के पास गोरखपुर आ गए। 1992 में महंत के उत्तराधिकारी के रूप में उन्हें योगी आदित्यनाथ के रूप में पहचान मिली..तब उन्होंने अपने पिता से कहा था-
"बस यूँ समझ लो कि अब ..अजय सिंह बिष्ट मर चुका है..!"
कैसा संयोग है कि एक आचार्य गोपेश्वर कोठियाल की मृत्यु के बाद उनकी मशाल "युगवाणी" को उनके पुत्र संजय कोठियाल अनवरत देदीप्तिमान रखे हैं तो ..अजय सिंह बिष्ट की आभासी मृत्यु को स्वयं अजय सिंह ने चोला बदलकर प्रकाशवान किया है..!
आचार्य जी का पुण्य स्मरण और योगी आदित्यनाथ को ढेरों शुभकामनाएं...!

मंगलवार, 14 जून 2016

ऊपर की कमाई या कुछ और...?

मेरे सामाजिक सरोकार-....जिन्हें लेकर आज फिर पशोपेश में हूं। निश्चय करना मुश्किल है कि कल का घटनाक्रम आपसे किन शब्दों में साझा करूं। निजता के उलंघन से बचने के लिए एक पात्र गढ़ लेते हैं जिसका नाम है "सार्थक"। 
 ये सार्थक मेरे अधीन ही तैनात है ठीक ठाक नौकरी है सामाजिक सम्मान भी, सेवाकाल में पिता की मृत्यु के उपरान्त अनुकम्पा के आधार पर नौकरी में आया था...एक संपन्न और भरे पुरे परिवार से वैवाहिक सम्बन्ध हुआ दो बच्चे हैं एक बेटा और एक बेटी.... सार्थक के ससुरालीजन मेरे पास और रोते रोते अपना दुखड़ा सुनाया। बोले- 
"सार्थक आजकल अपनी पत्नी के साथ पशुवत व्यवहार कर रहे है...जिसका कारण उनकी तैनाती क्षेत्र है ...." 
मैंने अचकचाकर पूछा- "क्या मतलब?" 
उन्होंने बताया-"सर दरअसल जहाँ वो तैनात हैं वहां ऊपरी कमाई बहुत है.....इस ऊपर की कमाई से उसने एक विवाहेत्तर संबन्ध भी पाल लिया है ...." 
"ओह..." मैंने ध्यान से उनके बात को पूरा सूना। 
वो आगे बोले- "सर प्लीज सार्थक की तैनाती किसी ऐसे क्षेत्र में कर दीजिये जहाँ ऊपर की कमाई बंद हो जाए...हमें विश्वास है कि ऐसा करने से वो अपनी पत्नी के प्रति सामान्य हो जाएगा और उसका विवाहेत्तर सम्बन्ध समाप्त हो जाएगा.." 
मुझे उनका अनुरोध कुछ अटपटा सा अवश्य लगा लेकिन मैं सोच में पड गया की क्या सार्थक के ससुरालीजन सच कह रहे हैं? क्या सचमुच ईजी मनी या ऊपर की कमाई ही इसका कारण है..या कुछ और...? 
मैंने सार्थक के ससुरालीजनों को विदा किया और उसके बाद सार्थक को बुला भेजा। सार्थक आये और एक अनुशासित कारिंदे की भांति चुपचाप खड़े रहे। मैंने इस बिषय पर वैसी ही औपचारिक हिदायतें दीं जो सामान्यतः ऎसे मामलों में दी जाती है साथ ही धमकाया भी कि-
"अगर तुम्हारी पत्नी की ऒर से लिखित शिकायत आ गयी तो ससपेंड कर दूंगा तुम्हे..! समझे..!" 
"जी सर..!" वह सिर झुकाकर चुप-चाप सुनता रहा..फिर चला गया उसके जाने के बाद मैंने स्टेनो को बुलाया और डिक्टेशन देते देते रुक गया... क्या सचमुच कम महत्वपूर्ण क्षेत्र में सार्थक की तैनाती करना इस समस्या का हल होगा? यदि यह प्रश्न आपके सामने होता तो आप क्या निर्णय लेते?..अपनी सलाह दीजिये...! '
(जारी)

शनिवार, 29 अगस्त 2015

श्रीयुत धीरेन्द्र वर्मा जी के साथ खिंची यह सेल्फी

हिंदी साहित्य का एक कालजयी उपन्यास है "चित्रलेखा"। इसके रचयिता श्री भगवतीचरण वर्मा की आज 112 वीं जयन्ती है ।
  भगवती बाबू ने यह उपन्यास 1934 में लिखा था जिसके छ वर्ष बाद 1940 में पहली बार इस पर आधारित फिल्म "चित्रलेखा" बनाई गयी । दुसरी बाद इस उपन्यास पर आधारित फिल्म 1964 में पुनः बनी और सुपर हिट रही... इस फिल्म से कमाए हुए पैसे से ठीक छ वर्ष बाद 1970 में भगवतीचरण वर्मा ने महानगर लखनऊ में मकान बनाना आरम्भ किया और घर का नाम रखा "चित्रलेखा"। 
100 से अधिक संस्करण वाला उपन्यास "चित्रलेखा" आज 81 वर्ष का हो गया है तथा महानगर की यह "चित्रलेखा" 45 वर्ष की हो गयी है जिसमें आज उनके छोटे पुत्र साहित्यकार श्री धीरेन्द्र वर्मा निवास करते हैं।
  बीती रात यह महानगर "चित्रलेखा" ऐसी दीख रही थी ... उधर से गुजरा तो यह द्रश्य और श्रीयुत धीरेन्द्र वर्मा जी के साथ खिंची यह सेल्फी आपके लिए खीच लाया ....

बुधवार, 15 जुलाई 2015

देवता के सामने तडफती मछली ...(समीक्षा)

डॉ. धर्मवीर भारती की पहली पत्नी सुश्री कांता भारती ने तलाक के बाद वैवाहिक जीवन की मुश्किलों पर एक उपन्यास 'रेत की मछली' भी लिखा है। माना जाता है कि यह उनकी पीडाओं और अनुभूतियों की प्रस्तुति है।
धर्मवीर भारती का कालजयी उपन्यास गुनाहों का देवता पहली बार 1959 में प्रकाशित हुआ था। इस उपन्यास ने हिन्दी साहित्य में जो स्थान बनाया वह दूसरे किसी अन्य उपन्याय को न मिल सका। इस उपन्यास के पात्र चन्दर और सुधा को समूचे हिन्दी साहित्य ने अपने आस पास अनुभव किया। कहा जाता है कि इस उपन्यास के नायक चंदर के रूप में धर्मवीर भारती ने स्वयं का चरित्र जिया है। श्री भारती की पत्नी रही कांता भारती ने इस उपन्यास के प्रकाशन के 16 वर्ष बाद 1975 में एक उपन्याय लिखा 'रेत की मछली' गोया कि कवियों का प्रिय शगल रहे किसी नवयौवना के सोलहवां वर्ष की भांति धर्मवीर भारती जी के गुनाहों के सोलहवे वर्ष को राह दिखाने का प्रयास किया गया हो।
........निःसन्देह यह उपन्यास स्त्री विमर्श के चुनिंदा पठनीय उपन्यासों में स्थान रखता है। जहां गुनाहों का देवता में किशोरावस्था से आरंभ हुये प्रेम के प्रस्फुटन के चलते किशोरवय लडकें लडकियों की ऐसी बाइबिल है जिसे पढकर वे तकिया पर सिर रखकर आंसू भी बहाते है और जब यही बच्चे जवान होकर प्रौढावस्था की ओर बढते हैं तो एक बार फिर इस बाइबिल को निकालकर पढते हैं और सोचते हैं कि उसे पहली बार पढकर वे क्यों रोये थे। .....यह भावुक कर देने वाला उपन्यास है परन्तु गुनाहों के इस देवता के गुनाह वास्तव में कैसे थे इसे जानने के लिये कांता भारती की कृति रेत की मछली भी उन सभी पाठको ंद्वारा अनिवार्य रूप से पढी जानी चाहिये जिन्होंने गुनाहों का देवता को पढा है। निंसन्देह उपन्यास के शिल्प की दृष्ठि से यह गुनाहों के देवता की तुलना में काफी कमजोर कृति है परन्तु कहना न होगा कि यह गुनाहों के देवता का अविभाज्य पहलू अवश्य है और साथ ही महानता का मुखौटा पहने चंदर केे असली चेहरे को परत दर परत उधेडने वाला उपन्यास है।
''मैं आजीवन तुम्हारे साथ खडा रहूंगा''
नायक के द्वारा कहे गये इस वाक्यांश की अनुभूति को जब लेखिका नायिका के शब्दों में व्यक्त करती है तो वह भी लेखकीय धरातल पर धर्मवीर भारती के समानान्तर खडी मालूम देती है
''मैं आजीवन तुम्हारे साथ खडा रहूंगा गिनती के ये कुछ शब्द जीवन की नयी परिभाषा होते हैं एक नया आश्वासन होते हैं यह उस दिन मैने जाना..... घर तक का वह रास्ता न जाने कितना लंबा और अंधेरा महसूस हुआ । रह रह कर लगता जैसे कोई अनहोनी पीछा कर रही हो मैं तुम्हारे साथ खडा रहूंगा आजीवन शब्द गूंजते और में संयत होकर आगे चल पडती । उस लंबे रास्ते के साथ साथ मेरी यातना भी बढती जा बढ जा रही थी। मानसिक तनाव ने थोडी देर में ही मेरे रक्त में ज्वर फैला दिया था।''
ऐक और उदाहरण देखें-
''....कहकर वे कुर्सी से उठे और मेरी ओर आ गये । पहला आंसू शायद कठिनाई से निकलता है, किन्तु उसके बाद अंतिम आंसू कठिनाई से रूकता भी है। मैं रोती जा रही थी उन्होंनेआतुर होकर मेरा सिर अपनी बाहों में दबा लिया । स्नेह पाकर अब मन खुलकर रो लेना चाहता था। ..''
गुनाहों का देवता, वाकई भावुक कर देनेवाला उपन्यास है... लेकिन इस देवता के गुनाह कैसे थे... इसे जानने के लिए धर्मवीर भारती की पत्नी कांता भारती का उपन्यास रेत की मछली भी जरुर पढ़ना चाहिए... शिल्प की दृष्टि से रेत की मछली गुनाहों के देवता के बरअक्स बहुत कमतर है... लेकिन वो गुनाहों को जस्टीफाई करने की कोशिश करनेवाला नहीं, बल्कि महनता के मुखौटे के पीछे छिपे चेहरे को परत दर परत उधेड़ कर कलई खोलने वाला उपन्यास है.. इस दुर्लभ चित्र में कान्ता भारती जी उस सदी के महान लेखक हरिवंश राय बच्चन और सुमित्रानंदन पंत के साथ खडी दीख रही हैं। कांता जी का यह दुर्लभ चित्र आदरणीय श्री अनिल जनविजय जी के सौजन्य से प्राप्त हो सका है

गुरुवार, 14 मई 2015

समरथ को नहीं दोष गुसाई

अब तक निचले स्तर के न्यायालयों में भृष्टाचार की शिकायतें जन सामान्य में सुनी जाती थीं परन्तु इधर भारत के उच्च न्यायालयों ने जिस प्रकार का व्यवहार प्रदर्शित किया है उससे आम जन में इसके प्रति अच्छा संदेश नहीं गया है। चाहे निचली अदालत से सलमान खान को हुयी सजा का प्रकरण हो या तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री जयललिता का आय से अधिक संपत्ति वाला प्रकरण दोनो ही प्रकरणों में यह धारणा प्रबल हुयी है कि नामी गिरामी वकील करने से अपेक्षित न्याय मिलना अवश्यंभावी है। उच्च न्यायालय में सलमान खान के केस की अपील करने वाले अधिवक्ता हरीश साल्वे की कोर्ट में पहुंचने की फीस 30 लाख रूपये से लेकर 1 करोड रूपये प्रतिदिन बतायी जा रही है।
 .... सोचता हूं कि जिस देश में गरीबी की रेखा का पैमाना 32 रूपये प्रतिदिन ग्रामीण क्षेत्र तथा 47 रूपयें प्रतिदिन शहरी क्षेत्र में हो (गरीबी की नयी रेखा)
 ....और इतने निम्न मानक के बावजूद 21.92 प्रतिशत आबादी गरीबी की रेखा के नीचे जीवन यापन कर रही हो (भारतीय रिजर्व बैंक की वािर्षक रिपोर्ट 2012) ...और जहां आम आदमी पूरी उम्र कुछ लाख रूपया संग्रह करने में ही खर्च हो जाती हो वहां न्याय पाने के लिये इतना भुगतान करना क्या न्याय खरीदने जैसा नहीं है?



अभी इस खबर से निबट भी नहीं पाया था कि एक नयी खबर आयी कि माननीय उच्चतम न्यायालय ने एक मराठी लेखक के विरूद्ध आपराधिक मुकदमा चलाने का निर्णय इसलिये दिया कि उसने अपनी अभिव्यक्ति में महात्मा गांधी के लिये अपमान जनक शब्दों का प्रयोग किया था। एक ओर यही न्यायालय सोशियल मीडिया पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की वकालत करती है जिसके आड लेकर नामी गिरामी लोग कुछ भी उल जुलूल लिखकर सुर्खिया बटोरते हैं जिनमें माननीय सर्वोच्च न्यायालय से सेवानिवृत हुये न्यायाधीश तक शामिल हैं वही दूसरी ओर एक आम लेखक का गांधी जी के प्रति प्रदर्शित दृष्टिकोण उसके विरूद्ध आपराधिक मुकदमें का कारण बनता है।
 इन उदाहरणों के आधार पर न्यायपालिका के बारे में आम राय बस यही बन रही है कि '''समरथ को नहिं दोष गुसाई''''
 ....यूँ ही एक विचार मन में कौंधा कि क्या माननीय न्यायालय अपने एक पूर्व न्यायाधीश द्वारा लगातार गांधीजी के सम्बन्ध में व्यक्त किये जा रहे अपमानजनक शब्दों का संज्ञान ले सकता है? स्क्रीनशॉट के रूप में एक साक्ष्य ये रहा जिसमे गाँधी जी को "बेशरम ब्रिटिश एजेंट" और "देशद्रोही, विश्वासघाती" कहा गया है....   


शनिवार, 7 मार्च 2015

सफरनामा: योगदानकर्ता सेे उपनिदेशक कविताकोश तक का






विगत 15 नवम्बर को नई दिल्ली के एक बाहरी इलाके में संजय सिंन्हा फेसबुक फेमिली के समारोह स्थल में सैकडों की संख्या में देशी विदेशी चेहरे फेसबुक की दीवर से बाहर निकल कर ऐतिहासिक मिलन में शरीक होने आये थे। इनमें से अधिकतर ऐसे थे जो अपनी हर सुबह की शुरूआत आपस में ऐक दूसरे को गुड मार्निग कहकर ही करते थे परन्तु आज वे पहली बार मिल रहे थे। इन्हीं में से ऐक थी सुश्री शारदा सुमन जो बिहार के समस्तीपुर के ऐक मिडिल स्कूल में प्राधानाध्यापिका के घर अपै्रल 74 में जन्मी थी। मेरी बिटिया स्वीकृति से मिलकर वो इस तरह भाव विह्वल हो गयी मानो उन्हें अपनी मां मिल गयी हो। 


सुश्री शारदा सुमन जी की यह भावात्मकता अक्सर उनके फेसबुक अपडेट में दिखलाई देती रहती है परन्तु आभासी दुनिया से इतर वास्तविक रूप से उन्हें भावविह्वल देखने का पहला अवसर था।   फेसबुक के अधिकतर साथी सुश्री शारदा जी को कविताकोश की उपनिदेशिक के रूप में जानते हैं परन्तु मैं उन्हें कविताकोश के उस योगदानकर्ता के रूप में जानता हूं जिसने 30 मार्च 2009 को कविताकोश की सदस्यता ग्रहण की और एक अनाडी योगदानकर्ता की तरह विद्यापति के विबाहक गीत में अपना पहला संशोधन युनिकोड के स्थान पर अंग्रजी में किया था। 

कविताकोश पर अपनी इस पहली उपस्थित के बाद सुश्री शारदा जी कविताकोश में योगदान करने के गुर सीखकर लगभग तीन वर्ष बाद 27 अगस्त 2012 को पुनः कविताकोश से जुडी और इस कोश में कविता जोडकर अपना पहला योगदान गोपाल सिंह नेपाली की की कविता मेरा देश बडा गर्वीला जोडकर किया।
बचपन से साहित्यिक अभिरूचि के बावजूद इतने लंबे अंतराल तक साहित्य से दूर रहने का कारण पूछने पर सुश्री शारदा जी बताती हैं

  '' हम स्कूल कैम्पस में बने स्टाफ क्वार्टर में रहते थे. माँ की अभिरुचि हिंदी साहित्य में होने की वजह से, जिसमे उन्होंने भी स्नातकोत्तर डिग्री ली थी इसलिए घर का माहौल साहित्यिक था. बाद में मेरे शिक्षक ने भी अभिरुचि को बढ़ाने में मेरी भरपूर मदद की. माँ अब नहीं हैं, दो बहन और हैं जो कि अपने-अपने घर में सुखी हैं. मेरे घर में मेरे पति हैं और एक पन्द्रह साल का बेटा है. मेरे पति सिविल इंजीनियर हैं. मैंने कभी नौकरी के लिए कोशिश भी नहीं की है. सम्पूर्ण रूप से गृहिणी हूँ. शादी के बाद सारा समय घर पति और बच्चे को दिया. पति का भरपूर सहयोग मिला है. जब बच्चा थोड़ा बड़ा हुआ तब अंतरजाल पर सक्रिय हुई.''

आज उनका बेटा किशोर है और अपने पिता की भांति इन्जीनियर  ही बनना चाहता है साथ ही अपनी ंपढाई की ओर स्वयं समर्पित भी तो शारदा जी ने अपनी साहित्यिक अभिरूचि को कविताकोश के योगदानकर्ता के रूप निखारने का कार्य प्रारंभ किया। इस कार्य में उन्होंने जो धुंवाधार पारी खेली है उसे देखकर इस कोश के निदेशक श्री ललित कुमार जी के द्वारा इन्हें कविता कोश के नये अनुभाग मारिशस का प्रभारी बनाया और शनै शनै उन्होंने इस अनुभाग में बहुत सारा साहित्य जोड डाला। कविताकोश में क्षेत्रीय कविताओं की श्रेणियां बनाकर उन्हें इस कोश में रखने का काम आपने सफलतापूर्वक किया। 

अब आप कविताकोश की उपनिदेशक हैं। 

सुश्री शारदा जी स्वयं भी अच्छा लिखती है जो पूर्व में प्रकाशित भी हुआ है इसके बारे में पूछने पर वो बताती हैं

''पहले लिखा भी और बिहार की कुछ पत्र-पत्रिकाओं में छपा भी लेकिन लिखना अब छूट गया है. अब बस अन्य साहित्यकारों का लिखा संकलित ही करती हूँ. ''

अंतरजाल पर हिन्दी साहित्य को एकीकृत करने का प्रयास करने वाले अनेक मंच हैं जिनमें से सबसे अनूठा और वैश्विक पटल पर सर्वाधिक लोकप्रिय मंच कविताकोश है।
इस कोश में आज हिन्दी काव्य की विभिन्न विधाओं से संबंधित लगभग सत्तर अस्सी हजार पृष्ठ हैं। इस वेबसाइट पर इन सभी पन्नों को इसके सम्मानित योगदानकर्ताओं के द्वारा बनाया गया है।
शारदा जी इस कोश तक कैसे पहुंची इसके बारे में उनका कहना है -

''अंतरजाल पर कुछ सर्च करते-करते एक दिन कविता कोश पर पहुंची फ़िर बस इसी की हो कर रह गई. लगा कि इस अच्छी वेबसाइट में अभी बहुत कुछ करने को बचा हुआ है. उस समय मुझे जो चाहिए था इसमें मौज़ूद था. मेरे पास ख़ाली समय था और साहित्य में अभिरुचि थी बस जुट गई. इन दोनों परियोजना में अभी भी बहुत कुछ रह रहा है जिस पर हम लगातार काम कर भी रहे हैं, लेकिन धन की कमी की वजह से बहुत सारा काम हो नहीं पा रहा है. फ़िलहाल तो हम अपनी योजनाओं के बारे में तब तक बात नहीं करना चाहते जब तक उसे अमली जामा न पहना दिया जाए. अंतर्जाल पर हालाँकि आज कविता कोश जैसी कोई वेबसाइट नहीं है फ़िर भी स्पर्धा तो है हीं. ''

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर जब उनसे यह जानने की कोशिश की गयी कि आज के जमाने में जब साइबर क्राइम बढता जा रहा है और महिलाओं को अंतरजाल पर अनेक अभद्र टिप्पणियों का सामना करना पडता है उसमें उन्हें किस प्रकार की समस्याओं से रूबरू होना पडा तो उन्होंने बताया कि -

''महिला होने के वजह से मुझे अभी तक किसी ख़ास परेशानी का सामना नहीं करना पड़ा है. हाँ कभी-कभी लोग शायद महिला होने की वजह से जुड़ने की कोशिश करते हैं. ''

रविवार, 25 मई 2014

एक देह

देह एक बूंद ओस की नमी
 ......पाकर ठंडाना चाहते है सब
 देह एक कोयल की कूक
 ......सुनना चाहते हैं सब
 देह एक आवारा बादल
 ......छांह पाना चाहते हैं सब
 देह एक तपता सूरज
 ......झुलसते हैं सब
 देह एक क्षितिज
 .....लांधना चाहते हैं सब
 देह एक मरीचिका
 ......भटकते हैं सब
 देह ऐक विचार
 .......पढना चाहते हैं सब
 देह ऐक सम्मान
 .......पाना चाहते हैं सब
 देह एक वियावान
 .......भटकना चाहते हैं सब
 देह एक रात
 ......जीना चाहते हैं सब
 और
 देह ऐक दवानल
 ......फंस कर दम तोडते है सब
 (स्वरचित)......@ रचनाकार

मंगलवार, 31 दिसंबर 2013

नव वर्ष ''2014'' की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ ढेरों बधाइयाँ

आप सभी सुधी पाठकजनों को काव्य का संसार परिवार की ओर से नव वर्ष ''2014'' की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ ढेरों बधाइयाँ।

 नये वर्ष! कुछ ऐसा वर दो।
नये वर्ष! कुछ ऐसा वर दो।
मंगलमय यह जीवन कर दो।
विद्या विनय बुद्धि का स्वर दो ।
बढे आत्मबल ऐसा कर दो।
नये वर्ष! कुछ ऐसा वर दो।
भेद भावना को हटवा दो।
जीवन को आदर्श बना दो।
भब्य भावना लिंगित कर दो।
अतुल ज्ञान दे साहस भर दो।
नये वर्ष! कुछ ऐसा वर दो।
जड़ता तिमिर हृदय का हर लो।
ज्ञान प्रभा आलोकित कर दो।
क्रन्दन करूण छात्र का हर लो।
नव स्फूर्ति उमंगी भर दो।
नये वर्ष! कुछ ऐसा वर दो।
भौतिक बल बौद्धिक गरिमा दो।
 स्नेह प्रेम का पाठ पढा दो ।
हंस वाहिनी से मिलवा दो।
हम अंधो को ज्योति दिखा दो।
नये वर्ष! कुछ ऐसा वर दो।

 (लगभग 25 वर्ष पूर्व अपने छात्र जीवन में लिखी यह रचना दैनिक ‘अमर उजाला’ के रविवारीय बरेली संस्करण में वर्ष 1983 में प्रकाशित हुयी थी)

http://kavyasansaar.blogspot.in/search/label/रचनाकार%3A%20अशोक%20कुमार%20शुक्ला

मंगलवार, 24 दिसंबर 2013

बंताक्लाज की ओर से आप सभी को क्रिसमस की शुभकामनाऐं

जैसे जैसे मैरी क्रिसमस नजदीक आता जा रहा है मुझे एक सवाल परेशान किये जा रहा है कि एक ही परिवार के दो भाइयों संता और बंता के साथ दोहरा व्यवहार क्यों किया गया ।

क्या ये दोनो सौतेले भाई थे? तभी तो एक भाई सन्ताक्लाज को इतनी लोकप्रियता हासिल हुयी और दूसरे भाई बंताक्लाज का  (चुटकुले के सिवाय) कोई नाम भी नहीं लेता।

अब आज ही देख लो बंताक्लाज डेक्कन हेराल्ड पर रिक्शे से संताक्लाज के बच्चों को चर्च की ओर लेकर जाते हुये मिल गये,

 बहरहाल संताक्लाज की ओर से बधाइयां ओर उपहार खूब मिलें होगे



संताक्लाज के अलावा अब मेरे और बंताक्लाज दोनो की ओर से आप सभी को क्रिसमस की पूर्व संध्या पर क्रिसमस की अग्रिम शुभकामनाऐं

(नोट : सरदार बंताक्लाज का चित्र डेक्क्न हेराल्ड से साभार)


मंगलवार, 17 दिसंबर 2013

सरोकारनामा: व्यवस्था के प्रति विश्वास जगाने की कहानी

दयानन्द पाण्डेय का यह उपन्यास समूचे हिन्दीभाषी उत्तर भारत के एक आम कस्बे की कहानी है, समूचे उपन्यास में एक इमानदार अधिवक्ता का तहसील स्तरीय वकालत मे न टिक पाना और शनै शनै कुंठाग्रस्त होकर अवसाद का शिकार होना विद्यमान न्यायिक व्यवस्था की कलई भी खोलता है-


उस की प्रैक्टिस अब लगभग निल थी। कई बार तो वह कचहरी जाने से भी कतराने लगा। पत्नी के साथ देह संबंधों में भी वह पराजित हो रहा था। चाह कर भी कुछ नहीं कर पाता। एक दिन उस ने पत्नी से लेटे-लेटे कहा भी कि,
'लगता है मैं नपुंसक हो गया हूं।'
पत्नी कसमसा कर रह गई। आखों के इशारों से ही कहा कि,
'ऐसा मत कहिए। पर रमेश ने थोड़ी देर रुक कर जब फिर यही बात दुहराई कि,
'लगता है मैं नपुंसक हो गया हूं।' तो पत्नी ने पलट कर कहा,
'ऐसा मत कहिए।' वह धीरे से बोली,
'अब मेरी भी इच्छा नहीं होती।'
क्या पैसे की तंगी और बेकारी आदमी को ऐसा बना देती है? नपुंसक बना देती है? रमेश ने अपने आप से पूछा। 

समीक्षा पढें सरोकारनामा: व्यवस्था के प्रति विश्वास जगाने की कहानी
समीक्ष्य पुस्तक :

बांसगांव की मुनमुन
पृष्ठ सं.176
मूल्य-300 रुपए

प्रकाशक
संस्कृति साहित्य
30/35-ए,शाप न.2, गली नंबर- 9, विश्वास नगर
दिल्ली- 110032
प्रकाशन वर्ष-2012 

बुधवार, 11 दिसंबर 2013

विशेष तारीख 11-12-13 समय 14-15-16 दिन, महीना, वर्ष और समय सब एकान्तर क्रम से

आज एक विशेष तारीख है 11-12-13 दिन महीना और वर्ष एकान्तर क्रम से हैं ऐसी ही एक विशेष तारीख दो वर्ष पूर्व आयी थी 11-11-11 जब दिन महीना और वर्ष तीनो एक थे। उस दिन मैने एक विशेष कार्य किया था और वह था प्रख्यात लेखिका अम्रता प्रीतम की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित रखने के लिये भारत की तत्कालीन राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा देवी सिंह पाटिल को पत्र लिखना। आप सुधी पाठकजनों के लये अपनी उस पोस्ट का लिंक दे रहा हूं:
 
 अब दो वर्ष के बाद जब पुनः ऐसा ही विशिष्ट दिवस आया है तो यह भी एक महत्वपूर्ण मुहिम को लेकर आया है। कल ही मुझे गांधी ग्लोबल फेमिली का मेल मिला है जिसमें जनवरी के दूसरे सप्ताह में भारत से श्रीलंका जाने वाले पन्द्रह सदस्यीय दल में सम्मिलित किया गया है। इस दल में जम्मू कश्मीर के श्री मोहम्मद याकूब डार और गांधी जी के जीवन काल में बडी संस्था हरिजन सेवक संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री शंकर के सान्याल भी शामिल है।
 ठीक एक वर्ष पूर्व 1 जनवरी 2013 को जब हरदोई के गांधी भवन में सर्वोदय आश्रम के सहयोग से प्रार्थना सभा का आरंभ हुआ था तब यह नहीं सोचा था कि गांधी जी के नाम पर उत्तर प्रदेश के इस छोटे से शहर हरदोई में आरंभ हुयी इस छोटी सी मुहिम के कारण मुझे ऐसा महत्वपूर्ण अवसर भी मिल सकता है

शनिवार, 23 नवंबर 2013

मूर्तियां भी रंग चुकी हैं चुनावी रंग में

आजकल माहौल चुनावी है । गांव गांव में जागरूकता है और राजनैतिक चर्चाऐं हो रहीं हैं। यह लोकतंत्र में प्रतिनिधि चुनने की व्यवस्था के क्रम में एक अच्छा कदम है। 

ऐसे माहौल में बीते दिन एक गांव जाना हुआ। गांव के बाहर स्थित अंबेडकर पार्क में गौतम बुद्ध और बाबा साहब भीमराव अंबेडकर जी की प्रतिमा देखकर स्वयं को उसकी तस्वीर मोबाइल में कैद करने से नहीं रोक सका क्योकि बाबा साहब भीमराव अंबेडकर जी की इस प्रतिमा का रंग सामान्यः नजर आने वाली अंबेडकर जी प्रतिमाओं से भिन्न था।

विगत कुछ वर्षो में यह देखने को मिला है कि विभिन्न राजनैतिक दलों ने रंगों को भी जैसे अपने दल के लिये पेटेन्ट ही करा लिया है। 

ऐसे माहौल में इस ग्रामीण पार्क में स्थापित यह मूर्ति भी जैसे चुनावी महौल में रंग चुकी है। 

गेरूये रंग में रंगी यह मूर्ति कहीं आने वाले लोकसभा चुनाव के परिणाम की चुगली तो नहीं कर रही है ?

गेरूये रंग में रंगी यह मूर्ति कहीं आने वाले लोकसभा चुनाव के परिणाम की चुगली तो नहीं कर रही है 


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