मंगलवार, 4 जुलाई 2017

यकीन है मुझे...!

 वादा था... 
 सिर्फ प्रेम लिखूंगा..! 
 लेकिन 
 कैसे लिख सकूँगा..? 
 जब 
 अपने कमरे में 
 रस्सी के फंदे पर 
 झूलता मिला हो 
 कोई पहरुआ..? 
 जब आँखों के सामने 
 टूटे पड़े हों कुछ सपने..? 
 गौर से देखो मित्रों 
 उसी कमरे में मिलेगा- 
 टूटा हुआ भरोसा..! 
 मिलेगी सिसकती हुई आस...! 
 और शायद.. 
 मिल जाए 
 भटकी हुई व्यवस्था भी...! 
 अब सोचो- 
 ऐसे में कैसे निभेगा ? 
 सिर्फ प्रेम लिखने का वादा..! 
 फिर भी- 
 यकीन है मुझे 
 कि- 
 मैं सिर्फ 
 प्रेम ही लिखूंगा.!
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