सामाजिक जीवन में संवेदन शीलता का अभाव किस सीमा तक हो गया है इसका अनुभव सामान्यतः हम सभी को करना ही पड़ता है। ऐसे में मानवीय मूल्यों को बनाये रखने का मेरा एक छोटा सा प्रयास किस प्रकार सामाजिक और वैधानिक विवशताओं के चलते दम तोड़ता है इसका स्मरण कराती पूर्णतः सच्ची घटना पर आधारित एक कहानी ई पत्रिका साहित्य शिल्पी के 22 जून अंक में प्रकाशित हुयी है। बचपन में किसी कक्षा में पढ़ी हिन्दी साहित्य की प्रमुख प्रतिनिधि रचना ‘हार की जीत’ के उलट मानवीय संवेदनाओं की तिलांजलि के कारण इसका नाम ‘ष्जीत की हार’ ज्यादा सार्थक जान पड़ता है। यदि आप भी इस कहानी को पूरा पढ़ना चाहते हैं तो कृपया नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें , और हाँ कहानी पढ़ने के बाद अपनी टिप्पणी भेजना न भूलें।
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पराजित [कहानी] -अशोक कुमार शुक्ला |साहित्य शिल्पी: Sahitya Shilpi; Hindi Sahitya ki Dainik patrika#links#links#links#links#links
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