(1)
फट गयी है
आसमान की झोली
धरा यूँ बोली
(1)
फट गयी है
आसमान की झोली
धरा यूँ बोली
(2)
बादल छाये
धरती पर ऐसे
मोहिनी जैसे
अब आप के साथ इस (हाइकू) को इस आशा के साथ बाँट रहा हूँ कि शायद आप ही इस सुराग के माध्यम से रहस्योद्घाटन कर सकें।
सरहदों के पार से आती नई कविता की बयार>
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
लोकप्रिय पोस्ट
-
आदरणीय मित्रों , शुभप्रभात..! # पोस्टिंगनामा युगपुरुष अटलबिहारी बाजपेई और मदन मोहन मालवीय दोनों का जन्म आज ही के द...
-
शायद कोई पांच एक साल पुरानी बात है, किसी समारोह में स्मृति चिन्ह के रूप में दयानन्द पाण्डेय जी का उपन्यास 'बांसगांव की मुनमुन' मिल...
-
इसी तरह कडी दर कडी जुडते हुये बच जायेगी स्व0 अमृता प्रीतम की धरोहर स्व0 अमृता प्रीतम जी के निवास के25 हौज खास को बचाकर उसे राष्ट्रीय धरोहर क...
-
26 जुलाई का दिवस स्वतंत्र भारत के लिये एक महत्वपूर्ण दिवस है क्योंकि हम इसे कारगिल विजय दिवस के रूप में मनाते हैं इस दिन से जुड़ी कुछ यादें आ...
-
रूपान्तरण [कविता]- अशोक कुमार शुक्ला साहित्य शिल्पी: Sahitya Shilpi; Hindi Sahitya ki Dainik patrika
बहुत सुन्दर ||
जवाब देंहटाएंबधाई ||
बहुत पसन्द आया
जवाब देंहटाएंहमें भी पढवाने के लिये हार्दिक धन्यवाद